कहाँ हो तुम गिरधर गोपाल ?

कवि संदीप कुमार जैन”नवोदित”

कहाँ हो तुम गिरधर गोपाल ?
कहाँ ? नंद के गाँव में अब,
मानख की हंडिया लटकती है।
कहाँ ? छाछ की मटकी लेकर,
गोपियाँ भी अब कहाँ निकलती हैं।
वो गोपालों की टोली के,
ग्वाल-बाल भी कहाँ रहे।
जमुना तट, कदम्ब के नीचे,
बाँसुरी के सुर अब कहाँ बहे।
गोमाता संग बछड़ों का,
हुआ है देखो बुरा हाल।
फिर से आ जाओ धरती पर,
कहाँ हो तुम गिरधर गोपाल?

नीति-नियम सब भूल गए हैं,
भूल गए हैं सब शिष्टाचार।
धर्म का मर्म सभी अब भूले,
बढ़ रहा है पापाचार।
गीता के अमूल्य उपदेशों की,
सौगंध सभी अब खाते हैं।
सच को झूठ, झूठ को सच,
करके सब दिखलाते हैं।
हो रहे हैं चीर-हरण नित,
नारी हो गई है बेहाल।
फिर से आ जाओ धरती पर,
कहाँ हो तुम गिरधर गोपाल?

कर्म बिना फल पाने की,
सभी लालसा रखते हैं।
ऊपर की आमदनी का,
मीठा स्वाद भी चखते हैं।
कौरवों जैसे तोड़ रहे हैं,
रिश्ते-नातों के गठबंधन।
पर दुःख, पर पीड़ा पर,
नहीं होता अब स्पंदन।
दीन- दुखियों की व्याकुलता,
पूछ रही बस यही सवाल।
कहाँ हो तुम गिरधर गोपाल ?

कहाँ ? नंद के गाँव में अब,
मानख की हंडिया लटकती है।
कहाँ ? छाछ की मटकी लेकर,
गोपियाँ भी अब कहाँ निकलती हैं।
वो गोपालों की टोली के,
ग्वाल-बाल भी कहाँ रहे।
जमुना तट, कदम्ब के नीचे,
बाँसुरी के सुर अब कहाँ बहे।
गोमाता संग बछड़ों का,
हुआ है देखो बुरा हाल।
फिर से आ जाओ धरती पर,
कहाँ हो तुम गिरधर गोपाल ?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!